स्वस्थवृत्त और योग: आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ जीवन शैली

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स्वस्थवृत्त: निरुक्ति और परिभाषा

स्वस्थवृत्त शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है: स्व, स्थ एवं वृत्त

  • स्व: स्वामित्व, संपत्ति, स्वायत्तता या संयोजन। अर्थात स्वतः अपनी दोषादि की प्राकृत अथवा अविकृत अवस्था।
  • स्थ: स्थापयति स्थिरतां प्रतिष्ठायाम्। अर्थात अपनी प्राकृत अवस्था में स्थित रहना।
  • वृत्त: व्यवहार, आहार-विहार।

परिभाषा: जो वृत्त, कर्म, व्यवहार अथवा आहार-विहार दोष, धातु, मल आदि को उनके प्राकृत स्थान पर रखते हुए प्राकृत कार्यों का निष्पादन कराएं और उन्हें प्राकृत स्वरूप में बनाए रखें, वह स्वस्थवृत्त कहलाता है।

स्वस्थ व्यक्ति के लक्षण (Sushruta Samhita)

समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥ (S.S. 15/41)

वात आदि दोषों, समस्त तेरह अग्नियों तथा रस-रक्तादि सप्त-धातुओं का साम्यावस्था में होना, मल-मूत्र आदि के विसर्जन की क्रियाओं का सम्यक होना और आत्मा, मन एवं इन्द्रियों का प्रसन्न होना 'स्वस्थ' कहलाता है।

धातुसाम्य के लक्षण (Charaka Samhita)

मांसादि धातुओं का सम प्रमाण में होना, शरीर संहनन का सम होना, इन्द्रियों का दृढ़ होना और विकारों के बल से अभिभूत न होना धातुसाम्य के लक्षण हैं। इसमें भूख, प्यास, गर्मी, ठंडी एवं व्यायाम को सहन करने की सामर्थ्य, पाचन क्रिया का सम्यक होना और वृद्धावस्था का उचित समय पर आना शामिल है।

स्वास्थ्य की वैश्विक अवधारणा

WHO Definition: "Health is a state of complete physical, mental and social well-being and not merely an absence of disease or infirmity." (WHO-1948)

G20 Theme (2022): "One Earth · One Family · One Future" का मूल आधार भारतीय संस्कृति के "वसुधैव कुटुम्बकम्" सिद्धांत पर आधारित है। यह विचार स्वस्थवृत्त के सिद्धांतों से मेल खाता है क्योंकि स्वास्थ्य केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण पृथ्वी के कल्याण पर बल देता है।

दिनचर्या: स्वस्थ जीवन का आधार

प्रतिदिन करने योग्य चर्या या आचरण को दिनचर्या कहते हैं।

  1. ब्रह्ममुहूर्ते उत्तिष्ठेत्: सूर्योदय से लगभग 96 मिनट पूर्व उठना। इससे स्मरण शक्ति और स्फूर्ति बढ़ती है।
  2. उषःपान: सुबह खाली पेट 2–4 गिलास गुनगुना जल पीना। यह कब्ज दूर करने और विषाक्त पदार्थों को निकालने में सहायक है।
  3. मलत्याग: सुबह वायु काल में शौच जाना वात संतुलन के लिए आवश्यक है।
  4. मुख प्रक्षालन: स्वच्छ जल से मुख धोना।
  5. दन्तधावन: नीम, खदिर या करंज जैसी औषधीय दातून से दांत साफ करना।
  6. जिह्वा निर्लेखन: टंग क्लीनर से जीभ साफ करना।
  7. अञ्जन: नेत्रों की रक्षा के लिए औषधीय अंजन लगाना।
  8. कवल एवं गण्डूष: औषधीय द्रव्यों से कुल्ला करना।
  9. धूमपान: कफ विकारों के शमन के लिए प्रायोगिक धूमपान।
  10. अभ्यङ्ग: प्रतिदिन तेल से शरीर की मालिश करना। इससे वृद्धावस्था धीमी होती है।
  11. नस्य: नासिका में औषधीय तेल डालना। आयुर्वेद में नासिका को "शिरसो द्वारम्" कहा गया है।
  12. व्यायाम: शक्ति अनुसार व्यायाम (Walking, Yoga, आदि)।
  13. उद्वर्तन: औषधीय चूर्ण से मालिश करना, जो मोटापे को कम करता है।
  14. स्नान: शरीर की शुद्धि और मानसिक शांति के लिए।
  15. ताम्बूल सेवन: भोजन के बाद बिना तंबाकू वाला औषधीय पान।

ऋतुचर्या: मौसम के अनुसार जीवनशैली

ऋतुचर्या दोषों का संतुलन बनाए रखती है और रोगों की रोकथाम करती है।

  • हेमंत ऋतु: अग्नि प्रबल होती है; घी, दूध, तिल और पौष्टिक भोजन का सेवन करें।
  • शिशिर ऋतु: गर्म भोजन और उष्ण जल से स्नान हितकर है।
  • वसंत ऋतु: कफ का प्रकोप होता है; वमन कर्म और हल्के भोजन का पालन करें।
  • ग्रीष्म ऋतु: वात का संचय होता है; ठंडे जल, फल और तरल पदार्थों का सेवन करें।
  • वर्षा ऋतु: वात का प्रकोप होता है; उबला हुआ जल और पुराना चावल लें।
  • शरद ऋतु: पित्त का प्रकोप होता है; घी, दूध और शीतल भोजन का सेवन करें।

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योग: अर्थ, परिभाषा और महत्व

योग शब्द 'युज्' धातु से बना है, जिसके तीन अर्थ हैं: जोड़ना, समाधि में स्थित होना और संयम।

योग की परिभाषाएं

  • पतंजलि योगसूत्र: "योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।" (चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है)।
  • श्रीमद्भगवद्गीता: "समत्वं योग उच्यते।" एवं "योगः कर्मसु कौशलम्।"

योग के मुख्य प्रकार

आधारराजयोगहठयोगकर्मयोग
प्रवर्तकमहर्षि पतंजलिस्वात्माराम, गोरखनाथश्रीकृष्ण
उद्देश्यमन का नियंत्रणशरीर एवं प्राण शुद्धिनिष्काम कर्म
साधनअष्टांग योगआसन, प्राणायाम, षट्कर्मफल की इच्छा का त्याग

पञ्चकोश सिद्धांत

तैत्तिरीय उपनिषद् के अनुसार मानव शरीर पाँच कोशों से बना है: अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश।

अष्टांग योग के आठ अंग

  1. यम: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह।
  2. नियम: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान।
  3. आसन: स्थिरसुखमासनम्।
  4. प्राणायाम: श्वास-प्रश्वास की गति का नियंत्रण।
  5. प्रत्याहार: इन्द्रियों को विषयों से हटाना।
  6. धारणा: मन को एक स्थान पर स्थिर करना।
  7. ध्यान: एकाग्रता का निरंतर प्रवाह।
  8. समाधि: ध्येय मात्र का प्रकाश।

विरुद्ध आहार और उसके प्रभाव

जो आहार दोष, धातु और मल के विरुद्ध होकर शरीर में रोग उत्पन्न करे, उसे विरुद्ध आहार कहते हैं। इसके 18 प्रकार हैं, जैसे देश विरुद्ध, काल विरुद्ध, मात्रा विरुद्ध (घी + शहद समान मात्रा में), और संयोग विरुद्ध (दूध + मछली)।

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत

प्राकृतिक चिकित्सा में पञ्चमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के माध्यम से उपचार किया जाता है।

  • मृदा चिकित्सा: शरीर की अतिरिक्त गर्मी और सूजन कम करती है।
  • सूर्य स्नान: विटामिन डी का निर्माण और हड्डियों की मजबूती।
  • उपवास चिकित्सा: शरीर के शोधन और पाचन तंत्र को विश्राम देने के लिए।
  • जल चिकित्सा: विभिन्न तापमान के जल से रोगों का उपचार।

अधारणीय वेग और उनके परिणाम

आयुर्वेद के अनुसार शरीर के स्वाभाविक वेगों को नहीं रोकना चाहिए।

अधारणीय वेगरोकने से होने वाले रोगचिकित्सा
मूत्र वेगमूत्रकृच्छ्र, बस्तीशूलस्नेहन, स्वेदन
पुरीष वेगकब्ज, उदरशूलविरेचन, बस्ती
क्षुधा वेगदुर्बलता, अंगमर्दसुपाच्य भोजन
निद्रा वेगशिरोशूल, जम्भाईपर्याप्त निद्रा

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