आयुर्वेदिक औषधियाँ: प्रयोग, मात्रा और सेवन विधि

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1. दशमूल क्वाथ (Dashamoola Kwatha)

दशमूल क्वाथ आयुर्वेद का प्रसिद्ध वातशामक एवं शोथहर योग है। इसमें दशमूल के दस द्रव्य—बिल्व, अग्निमंथ, श्योनाक, पाटला, गम्भारी, शालपर्णी, पृथक्पर्णी, बृहती, कण्टकारी तथा गोक्षुर सम्मिलित होते हैं। यह विशेष रूप से वातजन्य रोगों, ज्वर, शोथ, आमवात, संधिशूल, कटिशूल, श्वास-कास तथा प्रसूति के बाद होने वाली दुर्बलता में उपयोगी है।

  • मात्रा: 40–80 मि.ली.
  • सेवन विधि: गुनगुने जल के साथ अथवा चिकित्सक के निर्देशानुसार भोजन से पूर्व।
  • अवधि: रोग की अवस्था के अनुसार 2–8 सप्ताह या अधिक।

पथ्य-अपथ्य: हल्का, सुपाच्य एवं वातशामक आहार जैसे मूंग की दाल, खिचड़ी तथा गर्म जल का सेवन करें। दही, ठंडी वस्तुओं एवं तैलीय भोजन से बचें।

तैयार किया गया क्वाथ 24 घंटे के भीतर उपयोग कर लेना चाहिए।

2. पुष्यानुग चूर्ण (Pushyanuga Churna)

पुष्यानुग चूर्ण स्त्रीरोगों में अत्यंत उपयोगी आयुर्वेदिक योग है। इसमें लोध्र, मुस्ता, मंजिष्ठा, पाठा, नागकेशर, आम्रबीज, शुण्ठी आदि लगभग 26 द्रव्यों का समावेश होता है। यह विशेष रूप से श्वेत प्रदर, रक्तप्रदर, अत्यधिक मासिक स्राव, गर्भाशय की दुर्बलता तथा योनि विकारों में लाभकारी है।

  • मात्रा: 3–6 ग्राम
  • सेवन विधि: चावल के मांड, शहद या जल के साथ भोजन के बाद।
  • अवधि: 1–3 माह
  • शेल्फ लाइफ: 2 वर्ष

पथ्य-अपथ्य: हल्का एवं पौष्टिक भोजन, दूध तथा फल का सेवन करें; अधिक तीखे, खट्टे एवं मसालेदार पदार्थों से बचें।

3. संजीवनी वटी (Sanjivani Vati)

संजीवनी वटी एक प्रसिद्ध दीपनीय, पाचन तथा आमनाशक योग है। इसमें विदंग, त्रिफला, पिप्पली, वचा, गुडूची, भल्लातक तथा शुद्ध वत्सनाभ जैसे द्रव्य सम्मिलित होते हैं। यह आमज्वर, अजीर्ण, अतिसार, ग्रहणी, विषम ज्वर तथा आमदोषजन्य रोगों में विशेष लाभकारी है।

  • मात्रा: 1–2 गोली
  • सेवन विधि: अदरक के रस या गुनगुने जल के साथ भोजन से पूर्व।
  • अवधि: रोगानुसार निर्धारित
  • शेल्फ लाइफ: 5 वर्ष

पथ्य-अपथ्य: हल्का एवं सुपाच्य भोजन लें; भारी एवं तैलीय भोजन से बचें।

4. चित्रकादि गुटिका (Chitrakadi Gutika)

चित्रकादि गुटिका अग्निदीपन एवं पाचन शक्ति बढ़ाने वाली प्रसिद्ध औषधि है। इसमें चित्रक, पिप्पली, मरिच, शुण्ठी, हिंग तथा अजमोद प्रमुख घटक हैं। यह मंदाग्नि, अजीर्ण, गैस, पेट फूलना, भूख की कमी तथा अपच में उपयोगी है।

  • मात्रा: 1–2 गोली
  • सेवन विधि: गुनगुने जल के साथ भोजन से पूर्व।
  • अवधि: 2–6 सप्ताह
  • शेल्फ लाइफ: 5 वर्ष

पथ्य-अपथ्य: सुपाच्य भोजन लें; तैलीय एवं भारी भोजन से बचें।

5. सिंहनाद गुग्गुलु (Simhanada Guggulu)

सिंहनाद गुग्गुलु वात-कफ एवं आमजन्य रोगों में प्रयुक्त प्रसिद्ध योग है। इसमें शुद्ध गुग्गुलु, त्रिफला, एरण्ड तेल तथा गंधक प्रमुख घटक होते हैं। यह आमवात, गठिया, संधिशूल, वातरक्त एवं जोड़ों की सूजन में विशेष लाभकारी है।

  • मात्रा: 1–2 गोली
  • सेवन विधि: गुनगुने जल या एरण्ड तेल के साथ भोजन के बाद।
  • अवधि: 1–3 माह
  • शेल्फ लाइफ: 5 वर्ष

पथ्य-अपथ्य: हल्का, वातहर भोजन करें; दही, ठंडी वस्तुओं एवं भारी भोजन से बचें।

6. योगराज गुग्गुलु (Yogaraja Guggulu)

योगराज गुग्गुलु वातरोगों की प्रमुख औषधि है। इसमें शुद्ध गुग्गुलु, त्रिकटु, त्रिफला, चित्रक, विदंग, अजमोद तथा अनेक वातशामक द्रव्य सम्मिलित होते हैं। यह संधिवात, आमवात, कटिशूल, गृध्रसी, मांसपेशियों के दर्द तथा वातजन्य विकारों में उपयोगी है।

  • मात्रा: 1–2 गोली
  • सेवन विधि: गुनगुने जल या दशमूल क्वाथ के साथ भोजन के बाद।
  • अवधि: 1–6 माह
  • शेल्फ लाइफ: 5 वर्ष

पथ्य-अपथ्य: वातहर एवं सुपाच्य भोजन लें; ठंडी एवं भारी वस्तुओं से बचें।

7. च्यवनप्राश अवलेह (Chyavanaprash Avaleha)

च्यवनप्राश आयुर्वेद का श्रेष्ठ रसायन योग है। इसके मुख्य घटकों में आंवला, दशमूल, पिप्पली, घृत, तिल तेल, शहद, चीनी तथा विभिन्न सुगंधित द्रव्य सम्मिलित होते हैं। यह प्रतिरक्षा शक्ति बढ़ाने, श्वसन तंत्र को सुदृढ़ करने, शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता दूर करने तथा दीर्घायु प्रदान करने में सहायक है।

  • मात्रा: 10–20 ग्राम
  • सेवन विधि: गुनगुने दूध के साथ प्रातः अथवा भोजन के बाद।
  • अवधि: लंबे समय तक
  • शेल्फ लाइफ: 3 वर्ष

पथ्य-अपथ्य: पौष्टिक एवं संतुलित भोजन लें; अत्यधिक तैलीय एवं जंक फूड से बचें।

8. गन्धकाद्य मलहर (Gandhakadya Malahara)

गन्धकाद्य मलहर बाह्य प्रयोग की आयुर्वेदिक औषधि है। इसमें शुद्ध गंधक, सर्जरस, मधुच्छिष्ट तथा तिल तेल प्रमुख घटक होते हैं। इसका उपयोग खुजली, दाद, एक्जिमा, त्वचा संक्रमण एवं अन्य चर्म रोगों में किया जाता है।

  • प्रयोग विधि: प्रभावित स्थान पर दिन में 1–2 बार लगाएँ।
  • अवधि: रोग समाप्त होने तक
  • शेल्फ लाइफ: 2 वर्ष

सावधानी: त्वचा की स्वच्छता बनाए रखें तथा खुजलाने से बचें।

9. अशोकारिष्ट (Ashokarishta)

अशोकारिष्ट स्त्रीरोगों की प्रमुख आयुर्वेदिक औषधि है। इसमें अशोक की छाल, धातकी पुष्प, जीरा, मुस्ता, हरितकी तथा अन्य द्रव्य सम्मिलित होते हैं। यह अत्यार्तव, कष्टार्तव, रक्तप्रदर, श्वेत प्रदर तथा गर्भाशय संबंधी विकारों में उपयोगी है।

  • मात्रा: 15–30 मि.ली.
  • सेवन विधि: समान मात्रा जल मिलाकर भोजन के बाद।
  • अवधि: 2–6 माह
  • शेल्फ लाइफ: 10 वर्ष

पथ्य-अपथ्य: संतुलित एवं पौष्टिक भोजन करें; अत्यधिक तीखे, खट्टे एवं मसालेदार पदार्थों से बचें।

10. कुटजारिष्ट (Kutajarishta)

कुटजारिष्ट अतिसार एवं ग्रहणी रोगों की प्रमुख औषधि है। इसके मुख्य घटकों में कुटज, धातकी, मुस्ता, अतिविषा तथा गुड़ सम्मिलित होते हैं। यह अतिसार, पेचिश, ग्रहणी रोग एवं आँतों के संक्रमण में लाभकारी है।

  • मात्रा: 15–30 मि.ली.
  • सेवन विधि: समान मात्रा जल के साथ भोजन के बाद।
  • अवधि: 2–8 सप्ताह
  • शेल्फ लाइफ: 10 वर्ष

पथ्य-अपथ्य: खिचड़ी, मूंग की दाल तथा हल्का भोजन करें; दूध एवं तैलीय पदार्थों से बचें।

11. पंचगव्य घृत (Panchagavya Ghrita)

पंचगव्य घृत में गोघृत, गोदुग्ध, गोदधि, गोमूत्र तथा गोमय रस का प्रयोग किया जाता है। यह अपस्मार, उन्माद, मानसिक विकार, ज्वर तथा पित्तजन्य रोगों में उपयोगी माना गया है।

  • मात्रा: 5–10 ग्राम
  • सेवन विधि: गुनगुने दूध के साथ प्रातः खाली पेट।
  • अवधि: 1–3 माह
  • शेल्फ लाइफ: 16 माह

पथ्य-अपथ्य: सात्त्विक भोजन करें; मद्य, मांस एवं अत्यधिक तैलीय भोजन से बचें।

12. बिल्वादि गुटिका (Bilvadi Gutika)

बिल्वादि गुटिका में बिल्व, सुरसा, देवदारु, हरिद्रा, पिप्पली, शुण्ठी तथा अन्य विषघ्न एवं दीपनीय द्रव्य सम्मिलित होते हैं। यह विषदंश, अतिसार, वमन, ज्वर, आम विकार तथा कुछ विषजन्य स्थितियों में उपयोगी है।

  • मात्रा: 1–2 गोली
  • सेवन विधि: मधु या गुनगुने जल के साथ भोजन से पूर्व अथवा चिकित्सक के निर्देशानुसार।
  • अवधि: रोगानुसार निर्धारित
  • शेल्फ लाइफ: 5 वर्ष

पथ्य-अपथ्य: हल्का एवं सुपाच्य भोजन लें; तैलीय एवं भारी भोजन से बचें।

पोषक तत्व एवं गैर-भारतीय न्यूट्रास्यूटिकल्स

प्रकारउदाहरणउपयोग
पारंपरिक (Traditional)टमाटर, सामन, सोयारक्तचाप नियंत्रण, कैंसर जोखिम में कमी, डायबिटीज़ जोखिम में कमी, एंटीऑक्सीडेंट, प्रतिरक्षा उत्तेजना
फंक्शनल फूड (Functional Food)एलोवेरा, ब्रोकलीघाव भरना, इम्यूनो-स्टिमुलेंट, सूजन-रोधी, कुछ कैंसर जोखिम में कमी, एंटीऑक्सीडेंट
डाइटरी सप्लीमेंट (Dietary Supplement)फोलिक एसिड, कैल्शियम, विटामिन Aलाल रक्त कोशिका निर्माण, न्यूरल ट्यूब दोष रोकथाम, हड्डी-दांत स्वास्थ्य, एंटीऑक्सीडेंट
प्रीबायोटिक्स (Prebiotics)Lactobacillus acidophilusआंत का स्वास्थ्य, दस्त उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं की प्रतिस्थापना
फोर्टिफाइड (Fortified)कैल्शियम युक्त संतरे का रसग्लाइसेमिक नियंत्रण में सुधार
रीकॉम्बिनेंट (Recombinant)गोल्ड कीवी फलप्रतिरक्षा तंत्र को सुदृढ़ करना

कुष्माण्ड अवलेह

मुख्य घटक: कुष्माण्ड (पेठा), घृत, शर्करा, मधु, पिप्पली, इलायची, दालचीनी आदि।

कार्यविधि: कुष्माण्ड अवलेह बल्य, बृंहण, रसायन तथा वृष्य गुणों से युक्त है। यह शरीर के धातुओं का पोषण करता है, ओज बढ़ाता है तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करता है। यह श्वसन तंत्र को बल प्रदान करता है तथा पित्त एवं वात का शमन करता है। मानसिक दुर्बलता एवं शारीरिक थकान में भी लाभकारी है।

बाल स्वास्थ्य (Pediatric Health)

प्रीणन मोदक (Preenana Modaka)

मुख्य घटक: घृत, मधु, शर्करा, पिप्पली, अश्वगंधा, विदारी, शतावरी आदि।

कार्यविधि: यह बालकों में धातुपोषण, वृद्धि एवं विकास को बढ़ावा देता है। अग्नि को प्रदीप्त कर पाचन सुधारता है तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। बल, बुद्धि एवं स्मरण शक्ति में भी वृद्धि करता है।

वृद्ध स्वास्थ्य (Geriatric Health)

च्यवनप्राश अवलेह (Chyavanaprasha Avaleha)

मुख्य घटक: आंवला, दशमूल, घृत, तिल तेल, मधु, शर्करा, पिप्पली आदि।

कार्यविधि: यह श्रेष्ठ रसायन योग है जो कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव क्षति से बचाता है। यह प्रतिरक्षा शक्ति बढ़ाता है, वृद्धावस्था की प्रक्रिया को धीमा करता है तथा श्वसन, हृदय एवं तंत्रिका तंत्र को बल प्रदान करता है।

प्रजनन स्वास्थ्य (Reproductive Health)

फल घृत (Phala Ghrita)

मुख्य घटक: गोघृत, शतावरी, अशोक, लोध्र, प्रियंगु, यष्टिमधु आदि।

कार्यविधि: फल घृत गर्भाशय एवं जननांगों का पोषण करता है। यह शुक्र एवं आर्तव धातु की गुणवत्ता में सुधार करता है, हार्मोनल संतुलन बनाए रखता है तथा गर्भधारण की क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है।

महिला स्वास्थ्य (Women's Health)

(क) सौभाग्य शुण्ठी पाक (Soubhagya Shuntipaka)

मुख्य घटक: शुण्ठी, घृत, गुड़, शर्करा, विभिन्न सुगंधित द्रव्य।

कार्यविधि: यह प्रसवोत्तर काल में अग्नि को सुधारता है, वात का शमन करता है, गर्भाशय की शुद्धि एवं पुनर्स्थापना में सहायता करता है तथा स्तन्य वृद्धि एवं शक्ति प्रदान करता है।

(ख) शतावरी घृत (Shatavari Ghrita)

मुख्य घटक: शतावरी, गोघृत, गोदुग्ध।

कार्यविधि: यह स्त्री प्रजनन तंत्र का पोषण करता है, पित्त एवं वात का शमन करता है तथा हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में सहायक है। यह गर्भाशय एवं स्तन ग्रंथियों को पोषण प्रदान करता है।

हृदय संरक्षण (Cardio-Protective)

(क) अर्जुन क्षीरपाक (Arjuna Ksheerapaka)

मुख्य घटक: अर्जुन छाल, दूध एवं जल।

कार्यविधि: अर्जुन हृदय की मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है, एंटीऑक्सीडेंट प्रभाव दिखाता है, रक्तचाप नियंत्रित करने में सहायता करता है तथा हृदय की कार्यक्षमता में सुधार करता है।

(ख) रसोन क्षीरपाक (Rasona Ksheerapaka)

मुख्य घटक: लहसुन, दूध, जल।

कार्यविधि: लहसुन रक्त में कोलेस्ट्रॉल कम करने, प्लेटलेट एकत्रीकरण कम करने, रक्तचाप नियंत्रित करने तथा धमनियों की सुरक्षा करने में सहायक है। यह हृदय रोगों के जोखिम को कम करता है।

खेल एवं व्यायाम (Sports Endeavor)

खर्जूरादि मन्थ (Kharjuradi Mantha)

मुख्य घटक: खजूर, मधु, द्राक्षा, मिश्री, जल।

कार्यविधि: यह शीघ्र ऊर्जा प्रदान करने वाला, तृष्णानाशक एवं बल्य पेय है। व्यायाम के बाद ग्लाइकोजन भंडार की पूर्ति करता है तथा शरीर में जल एवं इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है।

मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health)

ब्रह्म रसायन (Brahma Rasayana)

मुख्य घटक: हरितकी, आमलकी, पिप्पली, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, घृत, मधु एवं शर्करा।

कार्यविधि: ब्रह्म रसायन मेध्य रसायन है। यह मस्तिष्क कोशिकाओं का पोषण करता है, स्मरण शक्ति, एकाग्रता एवं बुद्धि में वृद्धि करता है तथा मानसिक तनाव, चिंता एवं आयुजन्य स्मृति ह्रास को कम करने में सहायक होता है। इसके एंटीऑक्सीडेंट एवं न्यूरोप्रोटेक्टिव गुण तंत्रिका तंत्र की रक्षा करते हैं।

पोषक तत्व तालिका (प्रति सेवन)

फॉर्मूलेशनसेवन मात्राऊर्जा (kcal)कार्बोहाइड्रेट (g)प्रोटीन (g)वसा (g)फाइबर (g)
कुष्माण्ड अवलेह100g320–34068–722–35–72–4
प्रीणन मोदक100g430–47055–605–618–223–5
च्यवनप्राश100g360–39072–751–26–82–3
फल घृत100g~9000099–1000
सौभाग्य शुण्ठी पाक100g390–43065–702–310–152–3
शतावरी घृत100g~9000099–1000
अर्जुन क्षीरपाक100ml65–755–63–43–40
रसोन क्षीरपाक100ml70–856–73–43–4<1
खर्जूरादि मन्थ100ml110–13026–301–20–11–2
ब्रह्म रसायन100g350–39066–702–36–82–3

प्रमुख आयुर्वेदिक योग एवं उनके उपयोग

आरोग्यवर्धिनी वटी

सन्दर्भ: R.R.S. Visarpa Chi. 20/106

घटक: शुद्ध पारद, शुद्ध गंधक, लौह भस्म, अभ्रक भस्म, ताम्र भस्म (प्रत्येक 10 ग्राम), त्रिफला (20 ग्राम प्रत्येक), शिलाजीत (30 ग्राम), गुग्गुलु, चित्रक (40 ग्राम), कटुकी (220 ग्राम), निम्ब स्वरस (पर्याप्त मात्रा)।

  • मात्रा: 250–500 mg
  • सेवन काल: 2 दिन
  • रोगाधिकार: जीर्ण ज्वर, मेदोदोष, कुष्ठ, यकृत विकार
  • अनुपान: अर्दक स्वरस, मधु
  • कालमर्यादा: कुष्ठ रोगी में मण्डल / 48 दिन

कुमार कल्याण रस

सन्दर्भ: B.R. Balaroga / 163

रस घटक: अभ्रक, मुक्ता, लौह, स्वर्ण, स्वर्ण माक्षिक (समान मात्रा), आलोय, बहवा।

  • मात्रा: 62.5 mg
  • अनुपान: दूध, मधु
  • रोगाधिकार: बालरोग, अतिसार, ज्वर, कास, श्वास

गर्भपाल रस

सन्दर्भ: R.T.Sa. Part-I, 140

घटक: हिंगुल, वंग, नाग, त्रिकटु, देवदारु, जीरा, धनियाँ, द्राक्षा, दालचीनी, इलायची, तेजपत्र, चव्य (1 भाग), लौह (½ भाग), श्वेत अपराजिता (7 दिन)।

  • मात्रा: 125–250 mg
  • अनुपान: द्राक्षा जल
  • रोगाधिकार: गर्भ रोग

चन्द्रप्रभा वटी

सन्दर्भ: Sha.Sa.M. 7/40

घटक: चन्द्रप्रभा, हल्दी, दारुहल्दी, यव, साजी क्षार, लौह, शहद, सेंधा नमक, सौवर्चल नमक, बिड नमक, त्रिफला, त्रिजात, षडुशन तथा अन्य द्रव्य।

  • मात्रा: 250–500 mg
  • अनुपान: दूध, जल
  • रोगाधिकार: प्रमेह, मूत्र रोग, पाण्डु

प्रवाल पंचामृत

सन्दर्भ: B.R. Gulma / 139

घटक: प्रवाल (3 भाग), मुक्ता, मुक्ता शुक्ति, कपर्द, शंख (1 भाग प्रत्येक), आक का दूध (7 भाग)।

  • मात्रा: 250 mg
  • अनुपान: दूध, मधु
  • रोगाधिकार: उदर रोग, पलिहा वृद्धि, अजीर्ण, अग्निमांद्य

आनन्द भैरव रस

सन्दर्भ: R.Sa.Sa. Jwara 2/103

घटक: वत्सनाभ, हिंगुल, टंकण, जातीफल (1 भाग), सोंठ, पिप्पली (2 भाग), मरिच (1 भाग), नींबू रस।

  • मात्रा: 250 mg
  • अनुपान: मधु, अदरक स्वरस
  • रोगाधिकार: ज्वर

योगेन्द्र रस

सन्दर्भ: B.R. Vatavyadhi / 506

घटक: रस सिन्दूर (1 भाग), स्वर्ण, कांत लौह, अभ्रक, वंग, मुक्ता (½ भाग), आलोय।

  • मात्रा: 125–250 mg
  • अनुपान: त्रिफला क्वाथ / मधु
  • रोगाधिकार: वात व्याधि, अर्श, मूत्र रोग

लक्ष्मीविलास रस

सन्दर्भ: B.R. Rasayana / 55

घटक: अभ्रक (48 भाग), पारद, गंधक (24 भाग), कपर्द, धतूरा, गोक्षुर, विजया, निकुल बीज, अतिबला, नागबला, वृद्धदारुक, जावित्री, विडंग, शतावरी, जायफल (12 ग्राम), नागवल्ली रस।

  • मात्रा: 250 mg
  • अनुपान: ताम्बूल स्वरस / मधु
  • रोगाधिकार: उदर रोग, प्रमेह, धातु दौर्बल्य

वसन्तकुसुमाकर रस

सन्दर्भ: R.Sa.Sa. Rasayana Vajikarana / 80

घटक: स्वर्ण माक्षिक, पारद, मुक्ता भस्म (4 भाग), वंग, नाग, लौह (3 भाग), स्वर्ण, रजत (2 भाग), गोदुग्ध, इक्षु, वासा, लाक्षा, उदीच्य, रंभाकंद, शतपत्र, जातीपत्र, मृगमद।

  • मात्रा: 125–250 mg
  • अनुपान: मधु
  • रोगाधिकार: क्षय, प्रमेह, वली, पलित

वसन्तमालती रस

सन्दर्भ: Si.Bhai.Ma.Ma. Jwara / 60

घटक: स्वर्ण, मुक्ता, हिंगुल, मृत्कर्ण, यशद, नवनीत।

  • मात्रा: 125–250 mg
  • अनुपान: मधु / पिप्पली चूर्ण, जीरा
  • रोगाधिकार: कास, ज्वर

चिन्तामणि रस

सन्दर्भ: B.R. Vatavyadhi / 502

घटक: रस सिन्दूर, लौह भस्म, स्वर्ण, वंग, नाग, रजत, ताम्र (मिश्रित अनुपात) तथा आलोय।

  • मात्रा: 125 mg
  • अनुपान: मधु / गिलोय स्वरस / बकरी का दूध
  • रोगाधिकार: वात-पित्त रोग, ब्रह्म

शंख वटी

सन्दर्भ: B.R. Agnimandya / 182

घटक: वत्सनाभ (3 ग्राम), शंख भस्म, पंचलवण, त्रिकटु, चिंचा क्षार, हिंगु (48 भाग प्रत्येक), प्रवाल (3 ग्राम)।

  • मात्रा: 250–500 mg
  • अनुपान: मधु, गुनगुना जल, छाछ
  • रोगाधिकार: अग्निमांद्य, अरोचक, ग्रहणी

श्वास कुठार रस

सन्दर्भ: Yo.Ra., Swasa / Page 373

घटक: प्रवाल, मनःशिला, टंकण, वत्सनाभ, पिप्पली, सोंठ (1 भाग), मरिच (4 भाग)।

  • मात्रा: 125–250 mg
  • अनुपान: मधु
  • रोगाधिकार: कास, श्वास, अग्निमांद्य, वातकफ रोग

कामदुधा रस

सन्दर्भ: R.Ta.Sa. Kharaliya Rasayana / 80

घटक: पंच कैल्शियम, गौरिक, गुडूची (समान मात्रा)।

  • मात्रा: 125–250 mg
  • अनुपान: जीरा / आमलकी चूर्ण / घृत
  • रोगाधिकार: पित्त विकार, अम्लपित्त, दाह
    कालमर्यादा: जीर्ण ज्वर – सप्ताह में 2 बार, भ्रम – 15 दिन

सूतशेखर रस

सन्दर्भ: Yo.Ra. Amlapita / Page 125

घटक: पारद, तांक्षण, वत्सनाभ, त्रिकटु, चतुर्भुषण, लौह, अभ्रक, ताम्र, धतूरा, बिल्व मज्जा, कर्चूर (समान मात्रा), भृंगराज।

  • मात्रा: 125–250 mg
  • अनुपान: मधु / घृत
  • रोगाधिकार: अम्लपित्त, गुल्म, कास, मंदाग्नि, त्रिदोष, अतिसार

नवायस लौह

सन्दर्भ: Cha.Sa.Chi. 16/70

घटक: त्रिफला, त्रिकटु, त्रिमद (1 भाग), लौह (9 भाग)।

  • मात्रा: 250 mg
  • अनुपान: मधु / घृत
  • रोगाधिकार: हृदय रोग, पाण्डु, कुष्ठ, अर्श

इच्छाभेदी रस

सन्दर्भ: B.Ra. Udararoga / 84

घटक: पारद, गंधक, सोंठ, टंकण, मरिच (1 भाग), जायफल बीज (3 भाग)।

  • मात्रा: 250 mg
  • अनुपान: शीतल जल / चीनी
  • रोगाधिकार: अनाह, उदर रोग, रक्तदोष

कृमिकुठार रस

सन्दर्भ: R.Ta.Sa. Kharaliya Rasayana / P. 103

घटक: कपूर (8 भाग), पलाश बीज (15 भाग), इंद्रयव, त्रयमाण, अजमोद, विडंग, हिंगुल, वत्सनाभ, नागकेसर (1 भाग), विजया रस, मूषाकर्णी, ब्राह्मी रस।

  • मात्रा: 125–375 mg
  • अनुपान: मधु, स्वर्ण क्षीरमूल क्वाथ
  • रोगाधिकार: कृमि रोग

पंचामृत पर्पटी

सन्दर्भ: B.R. Grahani / 461

घटक: पारद (8 भाग), गंधक (16 भाग), लौह (4 भाग), अभ्रक (2 भाग), ताम्र (1 भाग)।

  • मात्रा: 125–250 mg
  • अनुपान: मधु / घृत
  • रोगाधिकार: ग्रहणी, अर्श, अतिसार, ज्वर
    कालमर्यादा: अधिकतम 21 दिन

बोलपर्पटी

सन्दर्भ: Yo.R. Pradara / P 842

घटक: पारद (1 भाग), बोल चूर्ण (2 भाग)।

  • मात्रा: 2–3 रत्ती
  • अनुपान: शर्करा / दूध
  • रोगाधिकार: रक्तप्रदर, रक्तपित्त, रक्त अर्श

स्वर्ण बसन्त

सन्दर्भ: Rasamruta 3/95

घटक: वत्सनाभ (2 भाग), पारद (1 भाग), नवसादर (1 भाग)।

  • मात्रा: 125–250 mg
  • अनुपान: मधु / जीरा चूर्ण
  • रोगाधिकार: कास, श्वास, प्रमेह, मूत्रमार्ग रोग
    कालमर्यादा: 7 दिन – 1 माह

मकरध्वज

सन्दर्भ: B.R. Vajikarana 2/237

घटक: शुद्ध गंधक (12 ग्राम), पारद (96 भाग), गंधक (288 भाग), अलोय, कपास।

  • मात्रा: 125 mg
  • अनुपान: पान पत्ता / दूध / मधु
  • रोगाधिकार: दुर्बल हृदय, जरा, अग्निमांद्य, वाजीकरण
    कालमर्यादा: 1 वर्ष

कैसोर गुग्गुलु

सन्दर्भ: Sarangadhar Samhita, Madhyam khanda 7/72-81

घटक: त्रिफला, अमृता (768 ग्राम प्रत्येक), क्वाथ जल (6.144 लीटर), गुग्गुलु (768 ग्राम), त्रिफला (96 ग्राम), गिलोय (48 ग्राम), त्रिकटु (72 ग्राम), विडंग (24 ग्राम), दन्ती, निशोथ (12 ग्राम), घृत (पर्याप्त)।

  • मात्रा: 3 ग्राम
  • अनुपान: गुनगुना जल / मंजिष्ठारिष्ट / दूध
  • रोगाधिकार: कुष्ठ, व्रण, वातरक्त

योगराज गुग्गुलु

सन्दर्भ: Sarangadhar Samhita Madhyam khanda 7/56-69

घटक: नागर, हिंगु, पिप्पली, चव्य, पिप्पलीमूल, चित्रक, अजवायन, काला व सफेद जीरा, पाठा, सरसों (1 भाग), त्रिफला (40 भाग), गुग्गुलु (60 भाग), विडंग, रुचक, नीलकंठ, लौह, अभ्रक, मंडूर, रस सिन्दूर (16 भाग)।

  • मात्रा: 3 ग्राम
  • अनुपान: जल / मधु / गोमूत्र
  • रोगाधिकार: वात रोग, कुष्ठ, प्रमेह, गुल्म, कास

नारायण चूर्ण

सन्दर्भ: Sarangadhar Samhita, Madhyam khanda 7/83-91

घटक: चित्रक, त्रिफला, त्रिकटु, वचा, यवानी, पिप्पलीमूल, सौंफ, अजवायन, वचा, द्विक्षार, पंचलवण, कचूर, धनियाँ (12 ग्राम), निशोथ, दन्ती (36 ग्राम), सातला (48 ग्राम)।

  • मात्रा: 2–4 ग्राम
  • विरेचन मात्रा: 6 ग्राम
  • अनुपान: बेर जल (गुल्म), गुनगुना जल (उदर), दाड़िम स्वरस (अर्श), घृत (स्थावर/जंगम विष)

रस सिन्दूर

सन्दर्भ: RasaTarangini, Murcchana vigyaniya Taranga 6/203-234

घटक: पारद, गंधक (1 भाग), न्यग्रोध (पर्याप्त)।

  • मात्रा: 125 mg
  • अनुपान: मधु (पिप्पली+मधु – वात, त्रिकटु – पित्त, चित्रक – कफ), शिलाजीत, शर्करा, कपूर (व्रण)
  • रोगाधिकार: कफ, बालरोग, धातुक्षय, प्रमेह, शूल, भगंदर, शोथ, गुल्म

रस पर्पटी

सन्दर्भ: Rasa Tarangini, Murcchana vigyaniya Taranga 6/144-153, P: 116-117

घटक: पारद (1 भाग)।

  • मात्रा: 250–1125 mg
  • अनुपान: हिंगु+जीरा (ग्रहणी), दशमूल क्वाथ (वात), त्रिकटु (कफ), एरण्ड तेल (शूल), हरीतकी चूर्ण (सभी रोग)

कंकायन वटी

सन्दर्भ: Sarangadhar Samhita Surbharti Prakashan, Madhyam khanda 7/50-55, P: 134-135

घटक: यवानी, सफेद व काला जीरा, धनियाँ, मरिच, अपराजित, अजवायन, हिंगु, द्विक्षार, निशोथ, कचूर, हरीतकी, दाड़िम, चित्रक, सोंठ आदि।

  • मात्रा: 3 ग्राम
  • अनुपान: नींबू रस, मद्य (गुल्म), गोदुग्ध (पित्त गुल्म), गोमूत्र (कफ गुल्म), दशमूल क्वाथ (सन्निपात)

रैशनल प्रिस्क्रिप्शन नियम (NABH दिशानिर्देश)

  • रोगी की पहचान: नाम, आयु, लिंग, वजन (यदि आवश्यक), UHID, दिनांक एवं समय।
  • निदान लिखें: प्रारंभिक या अंतिम निदान का उल्लेख करें।
  • जेनेरिक नाम से लिखें: ब्रांड नामों की तुलना में जेनेरिक नामों को प्राथमिकता दें।
  • औषधि का पूर्ण विवरण: औषधि का नाम, शक्ति, खुराक का रूप, मात्रा, मार्ग, आवृत्ति एवं अवधि।
  • एलर्जी जाँचें: औषधि एलर्जी एवं पूर्व प्रतिकूल प्रतिक्रियाएँ दर्ज करें।
  • तर्कसंगत औषधि चयन: सही औषधि, सही रोगी, सही मात्रा, सही मार्ग, सही अवधि एवं लागत-प्रभावी चिकित्सा।
  • बहुऔषधि से बचें: केवल आवश्यक औषधियाँ लिखें।
  • एंटीबायोटिक्स का विवेकपूर्ण प्रयोग: केवल नैदानिक आवश्यकता होने पर।
  • स्पष्ट लिखें: पठनीय हस्तलेख या इलेक्ट्रॉनिक प्रिस्क्रिप्शन; खतरनाक संक्षिप्त रूपों से बचें।
  • रोगी निर्देश दें: सेवन का समय, भोजन संबंधी निर्देश, सावधानियाँ एवं फॉलो-अप सलाह।
  • प्रिस्क्रिप्शन प्रमाणित करें: डॉक्टर का नाम, पंजीकरण संख्या, हस्ताक्षर एवं दिनांक।
  • रिकॉर्ड एवं ऑडिट: प्रिस्क्रिप्शन रिकॉर्ड रखें तथा नियमित ऑडिट करें।

तर्कसंगत प्रिस्क्रिप्शन के 6 अधिकार

  • सही रोगी
  • सही औषधि
  • सही मात्रा
  • सही मार्ग
  • सही समय/आवृत्ति
  • सही अवधि

मुख्य उद्देश्य

  • सुरक्षित एवं प्रभावी उपचार
  • औषधि त्रुटियों को न्यूनतम करना
  • प्रतिकूल औषधि प्रतिक्रियाओं की रोकथाम
  • एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध में कमी
  • रोगी अनुपालन में सुधार
  • उपचार लागत में कमी

औषध सेवन काल एवं समय

क्रमऔषध सेवन कालसेवन का समयमुख्य उपयोग
1अनन्नखाली पेटकफ रोग, रसायन
2अन्नादौ (प्राग्भक्त)भोजन से पहलेअपानवायु, अर्श
3मध्येभोजन के मध्यसमान वायु, अग्निमांद्य
4पश्चात् (अधोभक्त)भोजन के बादव्यान एवं उदान वायु
5अन्तरभक्तदो भोजनों के बीचहृदय एवं जीर्ण रोग
6सभक्तभोजन के साथबालक, वृद्ध, दुर्बल
7सामुद्गभोजन से पहले व बादकास, श्वास, हिचकी
8मुहुः-मुहुःबार-बारतृष्णा, छर्दि, विष
9सग्रासप्रत्येक ग्रास के साथमुख एवं कण्ठ रोग
10ग्रासान्तरदो ग्रासों के बीचस्वरभेद, श्वास

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